…बस हैरान हूँ मैं!!

…भाई जा रहा था..उसको छोड़ने मैं भी रेलवे स्टेशन गयी थी!! हमलोग जल्दी हीं पहुँच गए..अभी भी ट्रेन आने में 30मिनट शेष थे…मैं भाई को समझा रही थी की देख ये करना वो करना…वो भी सर हिला के हामीं भर रहा था!! फिर उसने मुझे बोला दीदी सुनों तुम 5मिनट रुको मै आता हूँ…उसके जाने के बाद मैं अपने आसपास नज़रें दौड़ाने लगी क्या हैं? कौन है?? उसके पहले फुर्सत हीं नही था इन सब पर गौर करने का…सब वहाँ अपनी अपनी दुनिया में मशगूल थे..कहने को लोग तो बहुत थे वहाँ लेकिन मात्र भीड़ का हिस्सा बनने के लिए ही..सब वहाँ होकर भी नही थे!! खैर! ये तो सभी करते हैं मैं भी तो थोड़ी देर पहले तक वहाँ होकर भी वहाँ कहाँ थीं..

…भाई का इंतज़ार कर रही और मेरी निगाहें उसे इधर-उधर तलाश रही थी..तभी मैंने दूर एक बच्चे को देखा यही कोई 10 या 12 साल का होगा..वो ठीक से चल नही पा रहा था,मुझे लगा शायद उसके पैरों में परेशानी हैं लेकिन,थोड़ी देर ध्यान से देखने और समझने के बाद ये साफ़ हुआ की वो देख नहीं सकता…वो यथास्थान पर टटोलते हुए पहुँच गया और फटी हुई चादर बिछा के बैठ गया और अपने सामने एक बर्तन रख लिया…वो जब भी महसूस करता किसी के आने की आहट तो अपने हाथ में वो बर्तन लेकर हाथ आगे फैला देता..किसी को तरस आती तो दे देता कुछ रुपये बाकि सब तो अपनी दुनिया में मशगूल इन सब पर ध्यान जाने पर भी निगाहें फेर कर चलते बने!! यही सिलसिला चलता रहा.. फिर अचानक मैंने देखा की एक लड़का उस बच्चे के पास आया और एक बोर्ड पर कुछ लिख के उसके पास रख के चला गया..मैंने उसके बाद ये देखा की उस बच्चे के पास से जो भी गुजरता उसके बर्तन में सिक्के डालते हुए आगे बढ़ता..मैं सब समझने की कोशिश कर रहीं थी आखिर उस बोर्ड पर ऐसा लिखा क्या हैं…मैं उठ के जैसे हीं जाने को हुई भाई ने आवाज़ दी मुझे…मैं रुक गयी लेकिन अब भी उत्सुकतावश उधर हीं मैं एकटक निहार रहीं थी!! भाई कुछ बोल भी रहा था तो वो कुछ मुझे सुनायी नहीं दे रहा था..फिर भाई की ट्रेन प्लेटफार्म पर आयी..वो उसमे सवार हुआ भी नहीं था कि मैं भाग कर गयी उस बच्चे के पास रखें बोर्ड को पढ़ने…उसको देख के दंग रह गयी मैंने उसपे सिर्फ इतना लिखा था…2रुपया मात्र/- वो सारी बातें फिर से एक झटके में सामने आ गयीं जो पिछले कुछ समय में मैंने वहाँ देखा…ये सब देख के एक बात तो साफ़ हो गयी की लोगों को दूसरे की मज़बूरी नहीं दिखती हैं न हीं उनका दुःख,न हीं उनकी जरूरतें…दिखता हैं तो बस अपना स्वार्थ…जैसे हीं लोगों को ये साफ़ हुआ की उस बच्चे को मात्र दो रुपए देने हैं सबने डालने शुरू कर दिए उसके बर्तन में पैसे जो पिछले कुछ पल तक वहां से यूँ गुजर रहें थे जैसे उन्होंने कुछ देखा हीं नहीं और वो बहुत जल्दी में हैं!! जब उन्हें ये नज़र आया की दो रुपए हीं देने हैं तो उन्हें एहसास हुआ की चलो इसी बहाने पूण्य भी मिल जाएगा और ज्यादा पैसे भी ख़र्च नहीं होंगें!! साफ़ हो गया उस वक़्त एक बात की सबको सबकुछ नज़र तो जरूर आता हैं लेकिन उन्हें वो दिखाई तब देता हैं जब उसकी इज़ाज़त उन्हें उनकी जेब देती हैं!! आप सोच के देखें कभी तो आपको भी एहसास होगा की अगर हम वक़्त निकाले तो वक़्त जरूर निकलेगा लेकिन,उस वक़्त को हम निकालने की चाहत रखेंगे तभी नहीं तो फिर व्यस्तता किसके जीवन का हिस्सा नहीं हैं आजकल…
                            

                                 2k16©आपकी…Jयोति🙏

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31 thoughts on “…बस हैरान हूँ मैं!!

  1. Wonder words once again though i just wanted to mention one fact that everything else will back except time,what if we missed the beauty of life letting ourselves busy…
    जिन्दगी बहुत छोटी है व्यर्थ व्यस्त क्यू हो जाये फ़िर 😊

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      1. Haahaa…ooops i missed to give you a follow and keep writing,you write beautiful.
        I am Prashant and it looks very heavy with Sir( not used to of getting this accolade)😂😂
        Have a great day ahead🙏

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  2. 👏👏👏😢
    उसे दिखता न था.जिसे दिखता था वो देखता न था.जो देखता वो नजरअंदाज कर जाता.2 का सिक्का जेब से कटोरे तक.कटोरे से पेट तक.कोई देता कितना और वो भरता कितना.कटोरे भर का पेट.पहले पेट खाली.फिर पेट भरता होगा तो कटोरा खाली..

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  3. लिखने का उद्देश्य सराहनीय और और शैली भी अच्छी। पाठकों को घटना खुद से जोड़ती है। इसमें ही लेखनी की सफलता है।

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  4. और एक बार फिर वही सदाबहार लेखन..सबसे बड़ी ख़ासियत ये कि अापका धाराप्रवाह मन के विचारों को सजीवता के साथ लिखना..प्लेटफ़ार्म की उस भीड़ में खुद को खड़ा पाया और आपके शब्दों के साथ हर एक घटना को महसूस किया..अविस्मरणीय 👍

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    1. अवि सर इसमें कुछ बातें सही हैं और कुछ मेरे मन की उपज भी..यूँ कहिये बचपन की एक आदत थी हमारी हिंदी राइटिंग की कॉपी मे पन्ने को हमेशा खुद की कहानियों से हीं भरना…सभी शिक्षक भी हमेशा मेरी राइटिंग की कॉपी को चेक करते वक़्त मेरे लघु कहानियों को पढ़ते थे..अब फिर से वही सब सामने आ रहा..और आप जब यूँ पढ़ के अपनी राय रखते हैं तो आज भी वो सभी मेरे स्कूल के मास्टर साहब की यादें आपके साथ मेल खाती हैं!! थैंक यू सो मच सर..इतना प्रोत्साहित करने के लिए…मुझे तो पहले लिखने से डर लगता था लेकिन यहिं पर आपकी तरह हीं एक मिले उन्होंने कहा लिखों अच्छा लिखोगी जब दो लाइन के ट्वीट खुद से लिख सकती तो ब्लॉग भी लिख लोगी…आपकी वजह से भी अवि सर लिखने का कुछ मन करता….😊😊😊😊

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      1. ये मेरी ख़ुशक़िस्मती है कि यदि थोड़ा बहुत भी मैं आपको प्रोत्साहित कर पाया..मैं आपके शिक्षकों के समकक्ष तो नहीं पर आपने मुझे उन सभी के बराबर रखकर मेरा मान बढ़ा दिया..दिल से आभार ज्योति 🙏 आप जिस तरह कहानी के पात्रों को जीवंत कर देती हैं..मैं बहुत प्रभावित हूँ आपकी इस अनोखी क्षमता से..ढेरों शुभकामना

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  5. आपके शब्दो में अपने शब्द जोड़ते हुए इतना ही कहूँगा की हम व्यस्त भी तभी तक है जब तक हम चाहे वरना हर पल अपने और दूसरों के लिए हो सकता है।

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