🌼कसूर किसका??

बीते कुछ दिन कि हीं बात हैं या यूँ कहूँ वो दिन काश! बीतें हुए दिन हीं कहलाते और फिर कभी भी वो वाक्या हमारे समाज में दोहराया न जाता। खैर!ये तो होनें से रहा,हम कितने हीं आधुनिक क्यों न हो जाये लेकिन हमारे समाज के लोगों की सोच हम स्त्रियों के लिए हमेशा से पिछड़ी,संकुचित,दकियानूसी हीं रहेगी।  

मैं भारत देश की रहने वाली हूँ और मुझे गर्व हैं कि मैं भारतीय हूँ…लेकिन,गर्व करना और गर्व होने में बहुत अंतर होता हैं। गर्व होता हैं मुझे यहाँ के रीत-रिवाज पर,रिश्ते-नातों पर,संस्कृति पर…लेकिन यहाँ की मानवता पर जब भी गर्व करने को मन करता हैं तब-तब ये खुद आगे बढ़ के उसको शर्मशार करती हैं। 

कहने को तो यहाँ की औरतों को देवी की तरह पूजा जाता हैं, हाँ ये सच भी हैं.. पूजा तो होती हैं इनकी लेकिन सिर्फ पाषाण रूपी निर्जीव रूप में। यहीं होता हैं,होते आया हैं,और जब तक ये सृष्टि हैं तब तक ऐसा हीं होगा। कुछ नहीं बदलने वाला हैं न अभी न कभी!!

जब भी किसी लडक़ी के साथ कुकृति होती हैं तो उस समय भी हमारे सामाज के हर वर्ग के लोग सिर्फ और सिर्फ उस लड़की को ही जिम्मेदार ठहराते हैं..क्या सच में वो लड़की हीं खुद अपने बर्बादी का कारण होती है?? एक तो उस लड़की और उसके परिजनों पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता हैं ऊपर से ये बातें…”बताओं रात को लड़की को क्या जरुरत थी बाहर निकलने की,क्यूँ वो अपना सारा काम दिन में हीं नहीं निपटा लेती हैं.. क्या जरुरत हैं ऐसी जगह नौकरी करने की जहाँ छुट्टी रात को होती हैं,खुद सचेत नहीं रहेंगी तो भुगतेगा कौन.. और जाओ लड़कों की बराबरी करने।कैसे माँ-बाप,भाई-बहन हैं उस लडक़ी के क्या उन्हें नहीं पता था कि रात को बहशी घूमते हैं.. अब जबकि सबको पता हैं लड़की खुली तिजोरी की तरह होती हैं और जब खुली तिजोरी दिखेगी तो कौन नहीं साफ़ करना चाहेगा। ऐसी बातें करने वाले हम लड़कियों/औरतों को दिन में वहशियों से छुटकारा दिलवा सकते है क्या? हमारी सुरक्षा आश्वस्त करवा सकते है???

अब जब छोटी स्कर्ट पहनती हैं गोरी टाँगों की नुमाइश करती हैं,वेस्टर्न कल्चर का अनुशरण करती फिरती हैं,लड़कों के साथ पार्टी करती हैं.. घूमती-फिरती हैं तो ये सब क्या हम सहन कर पायेंगे.. अरे! ये खुद मौका देतीं हैं और जब कुछ उल्टा सीधा हो जाता तो रोते फिरती हैं। ये कहने वाले,औरत के साड़ी,सलवार कमीज पहनने पर उसकी सुरक्षा आश्वस्त करवा सकते है क्या?? मतलब एकदम घरेलु लड़कियां/औरतें,भगवान में विश्वास रखने वाली,कभी दारु,सिगरेट को हाथ न लगाने वालियों की सुरक्षा पक्की है,है न??

चलो फिर हम अपनी सुरक्षा के लिए कुछ सेल्फ प्रोटेक्शन के गुर भी सीख लें तो क्या फिर भी हम सुरक्षित रह पाएंगे इस समाज के हवशी दरिंदों से?? नहीं बिलकुल भी नहीं क्योंकि हम खुद को 2 4 और 6 लोगों से बचा सकते हैं लेकिन पूरी की पूरी बहशी समाज से हम मुकाबला नहीं कर सकते!! 

आज जबकि मैं कहीं भी बाहर निकलती हूँ तो मेरे घर पर मेरे माँ-पापा,दादा-दादी और मेरे दोनों भाई तब तक परेशान रहते हैं जब तक मैं घर नहीं आ जाती वो क्या मुझे लेकर चिंतित रहते हैं??जी कतई नहीं वो परेशान रहते हैं तो उन आशंकाओं को लेकर जो उनके मन में घर करके बैठी होती है कही की कुछ अनहोनी न हो जाये!! 

बहुत जगहों पर पहले लड़कियों के जन्म लेते हीं उन्हें मार दिया जाता था। सही करते थे लोग आज भी ऐसा ही होना चाहिए। क्योंकि लड़कियों को लाख पढ़ा-लिखा लो, कितना भी मानसिक और शारारिक तौर पर मज़बूत और सशक्त बना लो, बुर्के में छुपा लो,साड़ी पहना लो,जो चाहे कर लो,जब तक लोगों की घिनौनी मानसिकता नहीं बदलेगी,तब तक किसी न किसी तरीके से औरत रोज़ मरती ही रहेगी!!!
                             2k17©आपकी…Jयोति🙏

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93 thoughts on “🌼कसूर किसका??

  1. शुक्र है खुदा का जो एक नेक दिल इंसान के विचारों को पढ़ने का मुझे मौका मिला ।
    मै आपसे सहमत हूं jyoti

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  2. आपका यह ब्लाग हमारे समाज के मुंह पर एक तमाचे जैसा है जो अपनी बहू बेटीयो के लिए ‘उपदेश’ देने वाले परंतु दुसरी औरतो के लिए तमाशबीन बन कर देखने वाला या खुद तमाशा करने वाला रहता है।

    लड़की को जिम्मेवारी की जगह मौका समझने वाला हमारा पुरष समाज ब्लाग पढ़ कर शर्मीदा जरुर होगा।

    कसूर किसका……….ये वो सवाल है जो यदा कदा हमारे समाने आ खड़ा होता है जब भी कुछ ऐसी अनहोनी होती है परंतु दुर्भागय यह है कि हर कोई इसका जवाब दुसरे से चाहता है। खुद से कोई भी इसको जानने की कोशिश नही करता और ना ही खुद के दोष को देखने का प्रयास..

    धर्म की दृष्टि से देखा जाये तो औरत को शक्ति माना गया है और देवी देवताओ में भी पहले देवी का स्थान आता है जैसे…

    सीताराम ना की राम सीता
    राधेकृष्ण ना की कृष्णराधा
    लक्ष्मी नारायण ना की नारायण लक्ष्मी
    गौरीशंकर ना की शंकरगौरी…..

    हमारे देश के रीत रिवाज और सस्कृंति सच में गर्व करने वाली है पर जैसा आपने कहा “मानवता”…..वो किसी गहरे अंधेरे गड्ढे में गिरती जा रही है इसकी किसी को कोई चिंता नही।

    कसूर किसका …….. बहुत हद तक कसूर हमारे समाज के उस सिस्टम का है जिस ने हमेशा बेटे को बेटी से ज्यादा जरुरी समझा है। बचपन से लड़को के दिमाग में भरा जाता है की सब चीजों पर उनका हक पहले है।
    कहीं ना कहीं मनमानी करने और इसके चलते स्त्री की ईज्जत करने में हमारा पुरष वर्ग पीछे रह जाता है। हमारे समाज में और शिक्षा प्रणाली में औरत की ईज्जत करना और उसको बराबरी का हक देना असल में सिखाया ही नही जाता।

    वैसे भी कहा जाता है इंसान की नज़र का इलाज सम्भव है नज़रीये का नही……

    लचर कानून व्यवस्था के कारण डर का ना होना भी एक कारण है।
    आप दुबई जाये और वहां देखेंगे की रात में एक दो बजे भी अकेली औरत कही भी आ जा सकती है और किसी की हिम्मत नही की उस पर आंख उठा कर देख सके। वहां कानून इतने सख्त है और इतनी सख्ती से उनका पालन होता है कि हर कोई इंसान गलत काम से डरता है।

    आपने ब्लाग के माध्यम से बहुत नाजुक विषय को उठाया है और आशा है हमारी और हमारे समाज की सोच बदलेगी और बदलनी भी चाहिये।

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    1. विवेक सर…क्या खूब लिखते हैं आप…सच में मजा आ गया ये पढ़ कर..बहुत-बहुत आभार आपका ऐसे हीं सिखाते रहिये हमें…

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      1. धन्यावाद आपका 😊🙏🏻
        हर किसी के पास कुछ सीखने और कुछ सीखाने की गुंजाईश रहती है।
        आप बहुत अच्छा लिखते हो 🤓

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  3. मैंने कुछ दिनोनपहले इसी बात पे एक ब्लॉग पे कहा भी था गर लड़कियाँ सोना है और अगर सुनार ने उसकी कलाकृति को सँवरने के लिए बाहर खुले में रखा है तो किसे ये इजाज़त दी गई की उसे लूट लो .. हद नहीं तोड़ी हमने तो क्यूँ अपनी हदों में नहीं रहते 😦 बहुत सुंदर लेख है लिखती रहें । साधुवाद ज्योत्सना का ज्योति को

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    1. ज्योत्सना…आपकी तो हर पोस्ट मस्त होती हैं यार! आभार! आपके उस ब्लॉग को जरूर पढूंगी.. और सही कहा आपने..हद में रहना तो हम जानते हैं लेकिन उन्हें अपनी हदों का अता-पता कहाँ है😑😑😑

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  4. “पूजा तो होती हैं इनकी लेकिन सिर्फ पाषाण रूपी निर्जीव रूप में।” – कटु-सत्य

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  5. दास ने काफी गहरे तक आप क्या लिखने के बारे में सोचने के लिए। बहुत अच्छा अपने लेखन।

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  6. मैं भी दोषी, तू भी दोषी।
    दोषी हैं संसार, पूरा गांव-जवार।
    फिर भी
    बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ😢 😦

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  7. हम भी होते आवारा..अगर जो जमाना शरीफ न होता
    कितना शरीफ है आये दिन दिख जाता है..

    और आपने हमेशा बेहतरीन दर्शाया है ज्योति जी और लेकिन ईसमें पहली लाईन से अंत तक ऐसा लगा कि कुछ ऐसा जो हो रहा है आप पास.वो हो रहा था पहले भी.जारी है आज भी.नहीं पता चलेगा कबतक…नारी है बेटी बहू माँ है.माँ शब्द तो बहोत सम्मानित हैं.माँ कितनी भगवान जानें..जिसने हमें लिबास पहनना सिखाया हम उसे पहनना सिखा रहे.जैसे सब भगवान की हिफाजत में डंडा लिए खड़े रहते हैं.मने भगवान की हिफाजत करेंगे..क्या बतायें

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      1. मेरा तो जीना ही व्यर्थ लगता है…
        खैर बात बस ईतनी सी है यार कि जन्नत कि चाह में जन्नत को जहन्नुम बना दिया है.वर्ना क्या नहीं है यार यहाँ या फिर किसी के पास.सबकुछ है फिर भी ईमान कम पड़ जा रहा है.21वीं सदी आ गई अब कौन सी तालीम तहजीब चाहिए जो बार बार कम पड़ जा रही है.द्रोपदी का चीर हरण हुआ था तब कौन सा स्कर्ट चल रहा था.खेल दोनो पुरूष खेल रहे थे और दाँव पर स्त्री लगी.क्यों?गलती तभी हुई उनको कृष्ण के इंतजार के बजाय खुदी गड़ासा ऊठा सबको निगल जाना चाहिए था.सबको..जो पैदा कर पाल पोस ईतना बड़ा कर सकती वो निगल क्यो नही सकती?
        इन्हे सुधारने वाले सिधार गये यार ये नहीं सुधरे…

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      2. और तब तक नहीं सुधर सकते जब तक ये जिस्म रूपी भूख से ग्रसित रहेंगे! पहनावा क्या करेगा,इनकी नज़रें तो दीवारों के पीछे छिपी लड़की को भी न वख़्शे तो फिर ये रात क्या,दिन क्या…दर्द होता हैं लेकिन बयान नहीं हो पाता वो दर्द की आखिर कितना होता हैं…पश्चात् संस्कृति को ये समाज के ठेकेदार दोष देते हैं लेकिन कभी इन्होंने ये सोचा हैं कि ये खुद कितने मर्यादा में रहते हैं… खैर! सब बेकार की बातें हैं ये तो शायद तब हीं बंद होगा जब सच में इसको गड़ासे उठा के जवाब देना प्रारंभ होगा!

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      3. यही बात ज्योति जी..जानती हैं यार जी जैसा हालात लड़कियो का हर देश में है.हर देश में…उनको एक साथ मिलके पृथ्वी ही छोड़ देना चाहिए…विदेशी संस्कृति..ये खुद ईतने बिगड़े जाहिल अय्याश थे और अभी भी है पाश्चात संस्कृति ईन्हे क्या बिगाड़ती यार..मर्यादा नहीं वो परदा था यार ढक दिया जाता था सबकुछ समाज और ईज्जत का हवाला देकर.रोना तक था उसी के पीछे…नही तो ये कैसी मर्यादा है जो पुरूषो के लिए अलग है.कपड़ा घुटने से ऊपर होते ही मर्यादा पुरे कपड़े ऊतार देती है..एक अच्छा बहाना मिल गया है…सर्वे करिये आकड़े बटोरिये कानून फलाना ढेकाना..जो हो रहा है वो हर रोज हो रहा है हर रोज.बस जगह बदल जा रहे.गली बदल जा रही.लोग बदल जा रहे..चीखे वही है जो चीख चीख के कहती है हर रोज..लेकिन रोना है कि सारे बहरे भी वही है उन्हे सुनना ही नहीं है…फिर उनसे कहते क्यो हो कि वो सुनेंगे.वो तबतक न सुनेंगे जबतक उनका कोई अपना न हो.दुसरो का बस फीता लेके कपड़ा नाप लेंगे कितना छोटा था.

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      4. जी यही तो हमारे समाज की विडंबना हैं… घटिया,दकियानुसी सोच जब तक रहेगी कपडे की लंबी थान भी हम लपेट के चलेंगे फिर भी यही होगा..जो अभी हो रहा हैं..😢😢

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      1. मनुष्य वाली प्रजाति अब जानवर में तब्दील हो चुकी है , विषय ,भोग ,विलास के अलावा कोई विषय नहीं बचा है ! इसका सिर्फ एकमात्र उपाय है ताडना , जैसे जानवरों को ताडित करके समझाया जाता है ठीक वैसे और इसके लिए दूसरे शांत मनुष्यों को जानवर बनना पडेगा !

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      2. क्या हम जानवरों को ताड़ित करते हैं तो वो इंसान बन जाते हैं नहीं न…उनमें बदलाव तो तब आता हैं जब वो हमारी भावनाओं को समझने लगते हैं, हमारी बातों को मानने लगते है…इसलिए बदलाव तभी आएगा इनकी मानसिकता में जब वो हमारी भावनाओं से खुद को जोड़ कर देखेंगे..तब सबकुछ अपनेआप सही होने लगेगा!!

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      3. कैसी मानसिकता ? आज भारत आजाद हुए ६०+ साल हो गये मगर सोच विषय की भूख के अलावा और किसी क्षेत्र में आगे नहीं बढ पायी स्थिति और भी बदतर हुई है अगर प्राचीन काल की बात करें तब किसी स्त्रि को कुदृष्टि से देखना मात्र भी पाप की श्रेणी में आता था मगर आजकल किसी को कोई पाप दिखायी नहीं देता
        और ताडना ठीक उतनी जरूरी है जितना देश आजाद कराने के लिए लोगों का बलिदान था वरना अहिंसा से कभी कुछ नहीं हो पाता
        क्षमा चाहूंगा !

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      4. दोस्त! बात तो सही हैं आपकी लेकिन सच में ऐसा संभव होता तो आज मैं भी वही करना चाहती लेकिन हम भले ताड़ित कर ले उन्हें लेकिन फिर भी कुछ नहीं बदलेगा…फिर भी वो उन्हीं भोग-बिलास के पीछे भागेंगे..और ये बात तो हैं कि सच में हम प्राचीन काल में हीं सुरक्षित थे!! और आप ऐसा कभी न कहें…क्षमा रहेगा😊 सबको यहाँ अपनी स्वतंत्र रूप से बात रखने का अधिकार हैं और हम यहाँ हर दिन एक-दूसरे से हीं कुछ नया सीखते हैं.. इसलिए हमेशा अपना बहुमूल्य मत रखते रहिये…ये हमारे लिए बहुत मायने रखतें हैं!!👍

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      5. मेरे विचारों को इतना महत्व देने के लिए धन्यवाद !
        सबके अपने अलग अलग विचार होते हैं
        मगर मैं अगर ऐसा भविष्य में कभी देखता हूं तो मैं भावनाओं पर नियंत्रण नहीं कर सकता सर्वप्रथम ताडना का मार्ग ही चुनुंगा चाहे मुझे भी हानि पहुंचे , समझाना तो बाद की बात होती है !

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  8. Na kuchh khta bnta hai..na chup rhte ..i hate myself when i thought that they are also men who do not respect girls..mai srminda hu ki maine bhi ek purush ke roop me janm liya..aise chhoti soch wali country aur society me ..

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    1. अरे! नहीं मुझे तो गर्व है कि आज भी कोई है जिसको हमलोगों की तकलीफ़ में उसे भी दर्द होता हैं…अपनी सृष्टि क्या सिर्फ औरतों से चल सकती हैं भला जो आपको पुरुष होने पर शर्म आ रहा…बल्कि ऐसा सोचो की मैं खुद पर गर्व करता हूँ की मैं उन जैसों की सोच के दायरों से कहीं दूर अपनी अच्छी सोच के साथ इस समाज का हिस्सा हूँ!! ☺☺☺

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      1. Bdi taqlif hoti hai ..kis society me jee rhe hai hm ..sdiyo se julm hota chla rha hai .aaj hm apne modern khlate hai fir bhi soch whi ghtiya … Jis nari ne jivan deti h jivan bhr sath de fir bhi log apni soch kyu nhi badal skte..

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      2. हाँ यार.. सोचो तो बुरा तो लगता हैं लेकिन सिर्फ सोचने से तो कुछ होने से रहा… करना पड़ेगा कुछ इसके लिए हमलोगों को हीं, अब जबकि हम इस समाज का हिस्सा हैं कुछ कोशिशें हमें हीं करनी होगी तभी कुछ बदलाव संभव हैं..बदलाव के लिए लोगों की मानसिकता भी बदलना जरुरी हैं जो तब तक संभव नहीं है जबतक वो खुद न बदलना चाहेंगे!

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